नई दिल्ली | सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत संचालित नेशनल एक्शन प्लान फॉर ड्रग डिमांड रिडक्शन (एनएपीडीडीआर) कार्यक्रम लोगों को नशे की लत से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभा रहा है। असम के करीमगंज जिले के जलालनगर गांव के रहने वाले 30 वर्षीय राहुल शर्मा (ब बदला हुआ नाम) की कहानी इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जिन्होंने समय पर सहायता और उचित चिकित्सा के माध्यम से नशे की लत को मात दी और एक नई शुरुआत की।
मुश्किल हालात और नशे की शुरुआत
कम उम्र में पिता के निधन के बाद राहुल को परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए अपनी स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। आर्थिक तंगी, भावनात्मक समस्याओं और सीमित अवसरों ने धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाला। कुछ समय के मानसिक सुकून की तलाश में उन्होंने दोस्तों के साथ मादक पदार्थों का सेवन शुरू किया, जिसके चलते वे गंभीर रूप से नशे की गिरफ्त में आ गए। इस लत ने उनके स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और पारिवारिक संबंधों को बुरी तरह प्रभावित किया। वित्तीय संकट और सामाजिक बदनामी के बीच भी राहुल अपनी जिंदगी को दोबारा संवारना चाहते थे और अपना परिवहन व्यवसाय शुरू करने का उनका सपना था।
पुनर्वास केंद्र से मिला नया जीवन
राहुल के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें एनएपीडीडीआर के तहत करीमगंज में डब्ल्यूओडीडब्ल्यूआईसीएचईई द्वारा संचालित ड्रग डी-एडिक्शन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर (डीडीएसी) से सहायता प्राप्त हुई। चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं और केंद्र के अन्य कर्मचारियों की मदद से उन्होंने घर पर ही पुनर्वास प्रक्रिया पूरी की। इस दौरान उन्हें चिकित्सकीय सेवाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत और पारिवारिक परामर्श, संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (सीबीटी), 12-स्तरीय चिकित्सा तथा योग और ध्यान का लाभ मिला। इन व्यापक सेवाओं की बदौलत उनका आत्मविश्वास लौटा और वे अपने परिवार तथा समाज के साथ फिर से जुड़ने में सफल रहे। आज राहुल अपना छोटा सा परिवहन व्यवसाय सफलतापूर्वक चला रहे हैं, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ हुई है और वे अपने परिवार की बेहतर देखभाल करने में सक्षम हैं।
Source: Press Information Bureau (PIB), Government of India
Photo: PIB











