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भारत के नये युग की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियां और आत्मनिर्भरता

अंतरिक्ष रॉकेट और उपग्रह का सामान्य दृश्य

नई दिल्ली | भारत की अंतरिक्ष यात्रा 21 नवंबर 1963 को केरल के थुम्बा से एक साउंडिंग रॉकेट के प्रक्षेपण के साथ शुरू हुई थी, जो अब एक प्रस्तावित ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ और गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष उड़ान लक्ष्यों की ओर अग्रसर है। डॉ. विक्रम ए. साराभाई के दृष्टिकोण के तहत 1962 में INCOSPAR की स्थापना और 15 अगस्त 1969 को इसरो (ISRO) के गठन के बाद से अंतरिक्ष गतिविधियों ने देश की जमीनी समस्याओं को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अंतरिक्ष विभाग के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 2033 तक 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान और स्वदेशी तकनीक

भारत की लॉन्च क्षमता में पीएसएलवी (PSLV), जीएसएलवी (GSLV), एलवीएम3 (LVM3) और एसएसएलवी (SSLV) जैसे पारंपरिक वाहनों के साथ-साथ नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) शामिल है। सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹8,240 करोड़ के परिव्यय के साथ NGLV के विकास को मंजूरी दी, जो LEO के लिए 30 टन की अधिकतम क्षमता प्रदान करता है। इसके अलावा, इसरो ने ‘पुष्पक’ अंतरिक्ष यान के माध्यम से पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) तकनीक और 28 अगस्त 2016 को स्क्रैमजेट इंजन के हाइपरसोनिक परीक्षण की सफलता का प्रदर्शन किया है, जिससे भारत यह उपलब्धि हासिल करने वाला चौथा देश बन गया है।

इन-स्पेस संचालन और अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार

स्पेसडेक्स (SpaDeX) मिशन के तहत 16 जनवरी 2025 और 20 अप्रैल 2025 को दो उपग्रहों की सफल डॉकिंग के साथ भारत कक्षा में स्वायत्त डॉकिंग हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है। इसरो ने 300 mN स्टेशनरी प्लाज्मा थ्रस्टर और हरित प्रणोदन प्रणालियों का भी विकास किया है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने भारतीय उद्योग को 83 प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण के लिए 118 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, और 31 मार्च 2026 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप में संचयी निवेश लगभग 618.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है।

Source: Press Information Bureau (PIB), Government of India

Photo: PIB

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